कांग्रेस क्यों नहीं दे रही है हुड्डा को कमान

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हरियाणा के पूर्व मुख्यमंत्री भूपेंद्र सिंह हुड्डा ने अपने जन्मदिन के मौके पर शुक्रवार को अपनी ताकत दिखाई। देश की आजादी की तरह हुड्डा भी 70 साल के हुए हैं। दिल्ली में बेटे दीपेंद्र हुड्डा के सरकारी आवास से लेकर रोहतक तक खूब जश्न हुआ। हजारों की संख्या में समर्थक जुटे और हरियाणा व एनसीआर से छपने वाले अखबारों में दो दो पन्नों का विज्ञापन दिया गया, जिसमें उनके दस साल की सरकार की उपलब्धियां बताईं गईं। उनके इस शक्ति प्रदर्शन के दो कारण बताए जा रहे हैं। एक मकसद तो कांग्रेस आलाकमान पर दबाव बनाना है कि उनको प्रदेश कांग्रेस का अध्यक्ष बनाया जाए। दूसरा मकसद अपने समर्थकों को ताकत का अहसास कराना है कि वे अलग होकर पार्टी बना सकते हैं। बहरहाल, सवाल है कि हर तरह से सक्षम भूपेंद्र सिंह हुड्डा को कांग्रेस पार्टी प्रदेश कांग्रेस की कमान क्यों नहीं सौंप रही है? कई महीने से चर्चा चल रही है कि उनको अध्यक्ष बनाने का फैसला हो गया है। पर इस फैसले पर अमल नहीं हो पा रहा है। अब कहा जा रहा है कि कांग्रेस किसी दलित नेता को ही अध्यक्ष बनाए रखना चाहती है और इसके लिए कुमारी शैलजा के नाम की चर्चा है। असल में कांग्रेस आलाकमान ने हुड्डा को सीबीआई की जांच के नाम पर अध्यक्ष बनने से रोका हुआ है। जानकार सूत्रों के मुताबिक कांग्रेस के आला नेताओं की ओर से हुड्डा को इसकी जानकारी दे दी गई है। कहा जा रहा है कि सोनिया और राहुल गांधी को इस बात की चिंता है कि हुड्डा को प्रदेश कांग्रेस का अध्यक्ष बनाया गया तो सीबीआई की कार्रवाई तेज होगी और उसकी जांच में रॉबर्ट वाड्रा भी फंसेंगे। इसलिए कांग्रेस हुड्डा के साथ साथ वाड्रा को भी बचाने का प्रयास कर रही है। तभी कहा जा रहा है कि हुड्डा को ज्यादा फायदा कांग्रेस छोड़ कर अलग पार्टी बनाने में है। वे अलग पार्टी बनाते हैं और एनडीए में शामिल हो जाते हैं तो उनके खिलाफ कोई जांच नहीं होगी। वे सारे कानूनी पचड़ों से बच जाएंगे और अगर सब कुछ ठीक रहा तो उनका परिवार फिर से हरियाणा और केंद्र दोनों की सत्ता में आ जाएगा। इसका दूसरा फायदा यह होगा कि अगर खुदा न खास्ते कांग्रेस केंद्र में आ भी गई तो वह उनके खिलाफ जांच नहीं करा पाएगी क्योंकि उनके साथ वाड्रा का नाम जुड़ा हुआ है।

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