डैडी- रॉबिनहुड की तरह दिखाया गया है गवली को

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यह फिल्म मुंबई के एक माफिया डॉन अरुण गवली पर बनी है और साथ ही उसके व्यक्तित्व का एक स्तर पर महिमामंडन भी करती है। बड़े अपराधी आगे चलकर दंतकथा भी बन जाते हैं और इनमें से कुछ रॉबिनहुड का दर्जा भी पा लेते हैं। गवली को भी इस फिल्म मे रॉबिनहुड बताया गया है। रॉबिनहुड अपराधी तो होता है लेकिन गरीबों का भला भी करता है। कम-से-कम ऐसा मिथ बनाया जाता है। इस फिल्म में भी गवली को ऐसा ही दिखाया गया है। साथ ही उसके जीवन को ऐसा चित्रित किया गया है कि वह दूसरे कुख्यात अपराधी, जो दाऊद इब्राहीम जैसा लगता है, को चुनौती देता है। (वास्तव में दाऊद और गवली में कभी ठनी थी)। इस तरह गवली की छवि पर पाउडर-लिपिस्टिक लगाकर उसे दूसरे अपराधियों की तुलना में बेहतर बनाने की कोशिश की गई है। वैसे, बाल ठाकरे ने भी कभी गवली का समर्थन किया था पर बाद मे दोनों में खटपट हो गई थी।

यानी गवली का छवि निर्माण राजनेताओं ने पहले ही कर दिया था। फिल्म के पहले भाग में यह दिखाया गया है कि हालात की वजह से बीसवीं सदी के आठवें दशक में मुंबई की एक चाल में रहने वाला और मजदूर गवली अपने दो दोस्तों बाबू (आनंद इंगले) और रामा (राजेश श्रृंगारपुरे) के साथ मिलकर अपना गैंग बनाता है और इसी क्रम में अंडरवर्ल्ड के भाई, जिसका नाम मकसूद भाई (फरहान अख्तर) है, से शुरुआती मदद लेने के बाद उससे टकराता भी है। गवली का अपना रोमांटिक जीवन भी है। वह अपने बगल में रहने वाली मुस्लिम लड़की जुबैदा (ऐश्वर्या राजेश) से पहले इश्क करता है और फिर शादी। उसके बाद उसका धर्म परिवर्तन करा के उसे आशा नाम देता है। यही वाकया गवली को आगे चलकर सेकुलर भी बना देता है। मुंबई के दंगों (1993) के दौरान गवली दोनों धर्मों के लोगों की मदद भी करता है। वह अंडरवर्ल्ड का सरगना भी बना रहता है और राजनीति में भी कदम रखता है। वह भाईगिरी के मुकाबले डैडीगिरी करता है। दाऊद भाई कहलाता है और गवली डैडी। यही दोनों का फर्क है। फिल्म में मुंबई की उस दगड़ी चाल का चित्रण है जिसमें हमेशा झुटपुटा अंधेरा रहता है । अर्जुन रामपाल ने गवली की जो भूमिका निभाई है उसमें विश्वसनीयता है। धीमे बोलने वाला यह गवली किस तरह अपराध की दुनिया में कदम रखता है और हत्याएं करता हुआ अपराधजगत का सरगना बनके उभरता है उसे रामपाल ने बूखूबी उभारा है। लेकिन मकसूद भाई की भूमिका में फरहान बिल्कुल नहीं जमें। बरसों से बॉलीवुड में मुंबई के भाई की छवि बन गई है। फरहान न उसमें फिट होते हैं और न बाहर निकल पाते हैं। ऐश्वर्या राजेश को बहुत कम फ्रेम मिले हैं, पर जितने भी मिले हैं उसमें उनका काम जमता है।

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