क्रोध का पागलपन सर्वविनाश को आमंत्रण- मुनि मनितप्रभसागर 

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बाड़मेर टाइम्स नेटवर्क 

बाड़मेर- श्री कुशल कांति मणि प्रवचन वाटिका, सुखसागर नगर, कोटड़िया-नाहटा ग्राउण्ड में गच्छाधिपति आचार्य जिनमणिप्रभसूरी के शिष्य साहित्य सर्जक मनितप्रभसागर महाराज ने विशाल संख्या में विराजमान भव्यजीवों को संबोधित करते हुए कहा-क्रोध सर्वत्र विनाश ही विनाश करता है। प्रत्येक व्यक्ति के जीवन में बच्चों से बूढो तक, व्यापारी से व्यवहारी तक, शहरी से ग्रामीण तक इस क्रोध रूपी बीमारी ने घर कर लिया है।  क्रोध एक प्रकार का मानसिक रोग है जो बच्चों के दिमाग को, बूढ़ों के दिल को, स्त्रियों के घर को, साधु की साधुता को तबाह कर लेता है। क्रोध एक ऐसा जहर है जो जहां जाता है वहां सब कुछ समाप्त कर लेता है क्रोध न अपितु स्वयं के चित्त को बल्कि इसके साथ-साथ हमारे सामाजिक संबंधों के फिते पर कैंची की तरह कार्य करता है अर्थात क्रोध हमारे व्यवहारिक संबंधों को, हमारे रिश्तो को खराब कर लेता है।
मुनि भगवंत ने क्रोध की व्याख्या करते हुए इसे तीन प्रकार का बताया- पहला सात्विक- जो क्रोध बच्चों को पढ़ाने हेतु अथवा बच्चों की गलत आदतों को छुड़ाने हेतु किया जाता है। दूसरा राजसिक- स्वयं के अहंकार का पोषण करने हेतु किया जाने वाला क्रोध और तीसरा तामसिक- जिसमें स्वयं के स्वार्थ को सिद्ध करने हेतु दूसरों को दुख पहुंचाया जाता है। जो व्यक्ति दिन के 24 घंटों में से 12 घंटे क्रोध करता है उसकी जिंदगी घटिया किस्म की, जो 24 घंटे में से 18 घंटे प्रेम करता है उसकी जिंदगी मध्यम और जो व्यक्ति 24 घंटे क्षमा रखता है उसकी जिंदगी उत्तम किस्म की है। उत्तराध्ययन में कहा है कि – उपषम भाव के द्वारा ही क्रोध को नष्ट किया जा सकता है। क्रोध की आग वही लगती है जहां क्षमा रूपी पानी नहीं होता। हमें पेट्रोल नहीं बनना है जो उस क्रोध की आग कोे ओर अधिक बढ़ाएं,  हमें तो पानी बनना है जो क्रोध की आग को शांत कर दे। उन्होने कहा कि वर्तमान की स्थिति अत्यंत ही दयनीय है, जहां एक 4 साल के छोटे से बच्चे मैं भी क्रोध के कुसंस्कार है, ऐसा इसलिए क्योंकि आजकल के बच्चे अपने घर में, आस पड़ोस में, टेलीविजन इत्यादि के माध्यम से ऐसे ही दृष्य देखते हैं जिससे उनमें क्रोध के कुपरिणाम, स्वभाव में चिड़चिड़ापन उत्पन्न हो जाता है। अगर आप अपनी संतान को महावीर बनना चाहते हैं तो उनमें संस्कारों का बीजारोपण कीजिए, उन्हें अपना समय दीजिए उन्में धर्म रूपी पुष्प की सुरभी फैलाइयें। पूज्य मुनि प्रवर ने क्रोध की परिणामों को दूर करने हेतु क्या किया जाएँ? इस संदर्भ में जनसमूह को संबोधित करते हुए कहा-जब भी क्रोध आप पर भारी होना चाहे आप उस से कहिए – नो एन्ट्री क्रोध के कुपरिणाम को दूर करने के लिए सबसे अधिक आवश्यक है- अपनी सोच को बदलना। सकारात्मक सोच, सकारात्मक चिंतन को अपनाना। जब भी क्रोध आये तब चिंतन करें -क्रोध करने से मुझे कोई लाभ नहीं है क्यों आखिर क्रोध करके मैं अपने हृदय को बबूल के कांटे से छलनी छलनी कर रहा हूं? छोटी सी जिंदगी है, ऐसी छोटी सी जिंदगी में क्रोध करके मैं अपने जीवन को कलंकित न करूँ। बल्कि अपने भीतर में क्षमा, प्रेम, वात्सल्य को अपनाकर अपने जीवन के धरातल को सुसज्जित करूँ।इसलिए अपने जीवन को महकाने के लिए सभी के साथ प्रेम से व्यवहार करो, वाणी में मधुरता का संचार करो और प्रभु वीर द्वारा प्ररूपित क्षमा को भीतर में स्थान दो। महावीर का एक ही संदेश- क्षमा़ वीर का आभूषण है।
चातुर्मास व्यवस्था समिति के सहसंयोजक मदनलाल मालू (कानासर) ने बताया कि प्रवचन के अन्त में मनितप्रभसागर म.सा. द्वारा महाबल मलयसुन्दरी ग्रन्थ का वांचन प्रारम्भ किया गया। जिसको वोहराने का लाभ लूणीदेवी धर्मपत्नी नेमीचन्दजी संखलेचा परिवार ने लिया। सोमवार के संघ पूजन का लाभ स्व. टीपूदेवी धर्मपत्नी भूरमलजी बोथरा परिवार ने लिया। कल मंगलवार को आत्मविश्वास और पुरूषार्थ से सफलता की गारंटी विषय पर विशेष प्रवचन रहेगा।

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