जनता जागती है      

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   – डॉ इच्छाराम द्विवेदी प्रणव’

फिर करो हुंकार जनता जागती है
रक्‍त का प्रतिदान तुमसे माँगती है

सो गए तुम भूलकर अपनी प्रतिज्ञा
किस गुहा में लीन है वह तीव्र प्रज्ञा

देश का सम्मान क्यों कर सो गया है
आजकल आखिर तुम्हें क्या हो गया है?

वह सतत संकल्प जो तुमने लिया था
वह समर्पण भाव जो तुमने जिया था

कर नहीं पाए उसे साकार अब तक
दे नहीं पाए उसे आकार अब तक

देर कितनी हो चुकी है तुम विचारो
हो सके तो आचरण अपना सुधारो

क्योंकि अब यह देश आकुल हो रहा है
क्योंकि अब यह देश पीड़ा ढो रहा है

फूटती है आग जनता के हृदय में
सिर्फ़ क्रंदन ही बचअ उसके निलय में

और तुम सुख धाम में खोए हुए हो
वारुणी, रंभा लिए सोये हुए हो

सोच लो यह प्राणघाती दृश्य होगा
पाप सत्ता ने यही हर काल भोगा

आग फूटेगी बड़ी विकराल होगी
जन भवानी की विषम करवाल होगी

कोटि कंठों की विकट हुंकार सुनकर
डोल उठते हैं सहज विकराल भूधर

टूटते उल्का दिशायें डोलती हैं
घोर भैरव रव पिशाची बोलती हैं

चूस लेंगी रक्‍त का हर कण तुम्हारा
छिन्न मस्ता हो पियेंगी रक्‍त धारा

भाग तुम सकते नहीं अपने किए से
और जी सकते नहीं अपने जिए से

इसलिए यह वक्‍त है अब जाग जाओ
देश के सम्मान पर बलिदान जाओ

बाँटने को देश, आगे बढ़ रहे हैं
काटने को देश, आगे बढ़ रहे हैं

काटकर उनको रिझाओ कालिका को
फिर नया उत्थान दो जगपालिका को

लोक-आराधन करो तुम राम हो कर
देश सेवा ही करो निष्‍काम हो कर

अब तुम्हारे हाथ में इसकी प्रगति है
यदि सँवारोगे नहीं तो दुर्गति है

क्योंकि अब जनता धनुष टँकारती है
रक्‍त का प्रतिदान तुमसे माँगती है

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