उग म्हारा सूरज उग रै

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– सुुशीला शिवराण

निराशा के अवसाद के

घटाटोप बादलों से ढकी
कवलित धरा
देख रही है प्राची की ओर
एकटक

 

उसकी आस का
अंतर्मन के हास का सूरज
उगा ही नहीं
कितने दिनों से
करती रही है वह
निरंतर
निर्विकार
सूरज की परिक्रमा

 

अटूट विश्वास को धारण कर
कि अवसाद की घनी घटाएँ
निराशा के काले बादल
कितना ही ढक लें
सूरज का उगना
अंधकार का छँटना
उतना ही निश्चित है
जितना
समय का नाना रूप धरना
परिवर्तित होना

 

बाट जोहते
अंतर्मन में गूँजते हैं
आत्मा पर
अमृत के छींटे-से बरसाते
मायड़ भाषा के गीत के बोल –
उग म्हारा सूरज उग रै
उग म्हारा सूरज उग रै

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