भाजपा के लिए दिल्ली की चुनौती

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भारतीय जनता पार्टी के लिए दिल्ली की चुनौती मुश्किल होती जा रही है। छोटी-छोटी ही सही लेकिन लगातार तीन हार के बाद पार्टी नेताओं के लिए आत्मचिंतन का समय है। भाजपा के साथ साथ राष्ट्रीय स्वंयसेवक संघ को भी सोचना होगा। दिल्ली विश्वविद्यालय छात्र संघ, डूसू का चुनाव वैसे तो पार्टियों की लोकप्रियता का अंतिम पैमाना नहीं है, लेकिन इसके नतीजे को हमेशा युवाओं के मूड का पैमाना माना जाता है। तभी डूसू चुनाव में कांग्रेस के छात्र संगठन एनएसयूआई का जीतना भाजपा के लिए झटका है। और अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद, एबीवीपी का हारना संघ के लिए झटका है।

इससे पहले एबीवीपी को जवाहरलाल नेहरू यूनिवर्सिटी के छात्र संघ चुनाव में भी हार का मुंह देखना पड़ा था। एक हफ्ते पहले ही यह संगठन वहां हारा है। पिछले साल यानी 2016 का जेएनयू का चुनाव बहुत उथलपुथल वाले माहौल में हुआ था। कुछ समय पहले ही कन्हैया कुमार और उमर खालिद का विवाद हुआ था। एबीवीपी को इसका फायदा मिला और एक सीट पर उसका उम्मीदवार जीत गया। लेकिन उस जीत के आधार पर आगे का रास्ता नहीं बन सका। इस बार एबीवीपी चारों सीटों पर न सिर्फ हारी, बल्कि उसे बहुत कम वोट मिले। वह सभी सीटों पर तीसरे नंबर पर रही।

उससे पहले दिल्ली की बवाना सीट पर हुए उपचुनाव में भाजपा बुरी तरह से हारी थी। आम आदमी पार्टी ने उसे हराया था। तभी भाजपा की दिल्ली की रणनीति को लेकर सवाल उठने लगे हैं। सबसे ज्यादा सवाल प्रदेश भाजपा अध्यक्ष मनोज तिवारी को लेकर हैं। उनको पूर्वांचल के वोटों को ध्यान में रख कर अध्यक्ष बनाया गया था। लेकिन वे भाजपा के लिए पूर्वांचल के वोट एकजुट नहीं कर पाए हैं, उलटे उनकी वजह से पार्टी में गुटबाजी बढ़ गई है। उनको दिल्ली का अंदाजा भी नहीं है, इसलिए वे कोई भी समीकरण नहीं साध पा रहे हैं। किसी भी पुराने नेता के साथ उनका तालमेल नहीं बन पाया है। बवाना से लेकर डीयू तक अरविंद केजरीवाल या अजय माकन ने जैसे काम किया, तिवारी उस समय तरह से काम नहीं कर सके। जिस तरह दिल्ली में किरण बेदी को पेश करना भाजपा को भारी पड़ा था, वैसे ही तिवारी का फैसला भी उलटा पड़ता दिख रहा है।

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