मोदी सरकार चाहे तो 38 रुपए लीटर मिल सकता है पेट्रोल, पर बड़ा सवाल- चाहेगी क्या?

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नरेंद्र मोदी सरकार पेट्रोल-डीजल की कीमतों को लेकर आलोचनाओं से घिरी हुई है। वहीं पेट्रोलियम मंत्री ने धर्मेंद्र प्रधान ने यह कहकर वित्त मंत्री अरुण जेटली के पाले में गेंद डाल दी है कि पेट्रोलियम पदार्थों की कीमत तभी तार्किक हो सकती है जब उन्हें वस्तु एवं सेवा कर (जीएसटी) के दायरे में लाया जाए। केंद्र सरकार ने एक जुलाई को देश में सभी अप्रत्यक्ष करों की जगह जीएसटी लागू किया था लेकिन पेट्रोलियम उत्पादों को अभी इससे बाहर रखा गया है। पिछले एक महीने में पेट्रोल की कीमत में सात रुपये से ज्यादा की बढ़ोतरी हुई है। मोदी सरकार ने 16 जून से पेट्रोल की कीमतों की दैनिक समीक्षा नीति लागू की है। उससे पहले तक पेट्रोल की कीमतों की पाक्षिक समीझा होती थी। आइए समझते हैं कि आखिर पेट्रोल की कीमतों को लेकर विवाद क्यों है? गुरुवार (14 सितंबर) को दिल्ली में पेट्रोल की कीमत 70.39 रुपये प्रति लीटर, कोलकाता में 73.13 रुपये प्रति लीटर, मुंबई में 79.5 रुपये प्रति लीटर और चेन्नई में 72.97 लीटर रही। पेट्रोल की ये कीमत अगस्त 2014 के बाद सर्वाधिक हैं। जब अगस्त 2014 में पेट्रोल की कीमत 70 रुपये प्रति लीटर से ज्यादा थी तो अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीम 103.86 डॉलर (करीब 6300 रुपये) प्रति बैरल थी। गुरुवार को अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमत 54.16 डॉलर (3470 रुपये) प्रति बैरल है। मोदी सरकार नवंबर 2014 से अब तक पेट्रोल के उत्पाद शुल्क में 126 प्रतिशत और डीजल के उत्पाद शुल्क में 374 प्रतिशत की बढ़ोतरी कर चुकी है। अगर बात पेट्रोल की करें तो अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल का जो मौजूदा भाव से उसके हिसाब से भारतीय पेट्रोलियम कंपनियों को एक लीटर पेट्रोल करीब 21 रुपये का पड़ रहा है। कच्चे तेल को इस्तेमाल लायक बनाने और बाकी खर्च करीब 10 रुपये प्रति लीटर आता है। यानी अगर सरकार कोई टैक्स न ले तो करीब 31 रुपये प्रति लीटर बिक सकता है। मौजूदा टैक्स व्यवस्था के तहत केंद्र सरकार के उत्पाद शुल्क के अलाव राज्य सरकार अलग-अलग दर से पेट्रोल-डीजल पर वैट लगाती हैं। मसलन, दिल्ली में 27 प्रतिशत वैट लगता है जबकि मुंबई में 47.64 प्रतिशत। इसीलिए पेट्रोल का दाम भिन्न-भिन्न राज्यों में अलग-अलग है।

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