संपत्ति का स्रोत पूछा गया तो क्या होगा?

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भारत के नेता एक बार फिर बड़ी मुश्किल में उलझे हैं। करीब डेढ़ दशक पहले जब चुनाव आयोग ने यह फैसला किया कि चुनाव लड़ने वाले नेताओं को एक हलफनामा देना होगा, जिसमें उनको अपनी संपत्ति का ब्योरा देना होगा, लेन देन की जानकारी देनी होगी और आपराधिक मामलों व शैक्षणिक योग्यता के बारे में बताना होगा। तब सत्तारूढ़ भाजपा ने इसका बड़ा विरोध किया था और सरकार अदालत में भी गई थी। अब फिर एक बार वैसी ही स्थिति पैदा हो गई है। अब कहा जा रहा है कि नेताओं को अपनी संपत्ति का स्रोत बताना होगा। इस बार चुनाव आयोग ने अपना पल्ला झाड़ लिया है। आयोग ने कहा है कि इस बारे में कानून बनाना संसद का काम है। सवाल है कि जब संपत्ति का ब्योरा देने का प्रावधान चुनाव आयोग ने अपने आदेश से कर दिया तो स्रोत बताने का काम वह संसद के जिम्मे क्यों छोड़ रही है? इस सिलसिले में एक गैर सरकारी संगठन लोक प्रहरी ने सुप्रीम कोर्ट में याचिका भी दायर की है, जिस पर हाल ही में सुनवाई हुई है। अगर नेताओं को संपत्ति का स्रोत बताने के लिए कानूनी रूप से बाध्य किया गया तो कई नेताओं को बड़ी मुश्किल होगी। बहुत से नेता हैं, जिनकी संपत्ति पांच, दस सालों में कई सौ गुना बढ़ी है। कई नेता ऐसे हैं, जिनकी गृहिणी पत्नी और पढ़ाई कर रहे बेटे के नाम से लाखों, करोड़ों की संपत्ति होती है। उन्हें सबकी संपत्ति का स्रोत बताना पड़ेगा। इससे उनके कानूनी पचड़े में फंसने और आय कर विभाग के निशाने पर आने का खतरा भी बढ़ जाएगा। तभी माना जा रहा है कि कोई पार्टी इस विचार का समर्थन नहीं करेगी। लेकिन अगर सुप्रीम कोर्ट ने इस पर कोई निर्देश दिया तो केंद्र सरकार और चुनाव आयोग दोनों को इस दिशा में पहल करनी पड़ सकती है।

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