पितृ पक्ष के दौरान क्यों दान किया जाता है पितरों को भोजन

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पितृ पक्ष की शुरुआत हो चुकी है। हिंदू पंचांग के अनुसार इस बार पितृ पक्ष की अवधि 15 दिनों तक रहेगी। पितृ पक्ष के दौरान सभी अपने पितरों को श्रद्धांजलि देते हैं। पितृ पक्ष हर साल अनंत चतुर्दर्शी के बाद आता है। इस वर्ष 6 सितंबर से लेकर 20 सितंबर तक पितृ पक्ष रहेगा। इस दौरान पितरों का श्राद्ध करने से उन्हें मोक्ष प्राप्त होता है। पौराणिक मान्यताओं के अनुसार इस दौरान हमारे पूर्वज मोक्ष प्राप्त करने के लिए अपने परिजनों के निकट आते हैं। इस पर्व में अपने पितरों के प्रति श्रद्धा और कृतज्ञता व उनकी आत्मा के लिए शान्ति देने के लिए श्राद्ध किया जाता है। ज्योतिषों के अनुसार जिस तिथि को माता-पिता, दादा-दादी आदि परिजनों की मृत्यु होती है, उस तिथि पर इन सोलह दिनों में उनका श्राद्ध करना उत्तम रहता है। जब पितरों के पुत्र या पौत्र द्वारा श्राद्ध किया जाता है तो पितृ लोक में भ्रमण करने से मुक्ति मिलकर पूर्वजों को मोक्ष प्राप्त हो जाता है और वो भगवान के ओर करीब पहुंच जाते हैं।

पौराणिक मान्यताओं के अनुसार महाभारत के युद्ध में जब कर्ण की मृत्यु हो गई थी तब उनकी आत्मा स्वर्ग में थी जहां उन्हें बहुत सारे गहने और सोना दिया गया था। परन्तु ऐसा कहा जाता है तब कर्ण भोजन की तलाश कर रहे थे तब उन्होंने इंद्र देव से पूछा कि उन्हें खाने की जगह सोना क्यों दिया गया है। तब इंद्र देव ने उनसे कहा कि उन्होंने जीवित रहते हुए पूरा जीवन सोना ही दान किया है लेकिन कभी श्राद्ध के दौरान अपने पूर्वजों को खाना नहीं दान किया। इसके बाद कर्ण ने इंद्र देव से कहा कि उन्हें ये ज्ञात ही नहीं था कि उनके पूर्वज कौन थे इसलिए वो कभी कुछ दान नहीं कर पाए। इसके बाद कर्ण को उनकी गलती ठीक करने का मौका दिया गया और उन्हें वापस 15 दिन के लिए पृथ्वी पर भेजा गया। इसके बाद उन्होंने अपने पितरों को याद करते हुए उनका श्राद्ध किया और उन्हें भोजन दान किया। इसलिए इस 15 दिन की अवधि को पितृ पक्ष कहा जाता है।

इसलिए श्राद्ध में ब्राह्मणों को भोजन करवाना एक जरूरी परंपरा है। ऐसा माना गया है कि ब्राह्मणों को भोजन करवाए बिना श्राद्ध कर्म अधूरा है। धर्म ग्रंथों के अनुसार ब्राह्मणों के साथ वायु रूप में पितृ भी भोजन करते हैं। ऐसी मान्यता है कि ब्राह्मणों द्वारा किया गया भोजन सीधे पितरों तक पहुंचता है। ब्राहमणों के साथ भोजन करने पर पितृ भी तृप्त होकर सुख-समृद्धि का आशीर्वाद देते हैं। भोजन करवाने के बाद ब्राह्मणों को घर के द्वार तक पूरे सम्मान के साथ विदा करना चाहिए क्योंकि ऐसा माना जाता है कि ब्राह्मणों के साथ-साथ पितृ भी चलते हैं।

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